गोवत्स द्वादशी,गोवत्स द्वादशी व्रत कथा,गोवत्स द्वादशी 2021,गोवत्स द्वादशी 2022,गोवत्स द्वादशी की कथा,गोवत्स द्वादशी 2020,गोवत्स द्वादशी की कहानी,गोवत्स द्वादशी की व्रत कथा,गोवत्स द्वादशी की पौराणिक कथा,बछ बारस गोवत्स द्वादशी की कहानी,गोवत्स द्वादशी साल 2020 में कब है,गोवत्स द्वादशी व्रत की पूजा विधि क्या है।।गोवत्स द्वादशी आरती,गौ वत्स द्वादशी,गोवत्स द्वादशी कब है?।।गोवत्स द्वादशी की आरती।।गोवत्स द्वादशी कब की है
गोवत्स द्वादशी
यह त्योहार कार्तिक कृष्ण पक्ष द्वादशी को आता है। इस दिन गायों और बछड़ों की सेवा की जाती है। इस दिन प्रातःकाल स्नानादि करके गाय-बछड़े का पूजन करें, फिर उनको गेहूँ के बने पदार्थ खिलायें। इस दिन गाय आदि का दूध, गेहूँ की बनी वस्तुएँ और कटे फल नहीं खाना चाहिए। इसके बाद गोवत्स द्वादशी की कहानी सुनकर ब्राह्मणों को फल दान दें।
गोवत्स द्वादशी की कथा
बहुत समय पूर्व भारत में सुवर्णपुर नामक नगर में देव दानी राजा राज्य करता था। उसके सवत्स एक गाय और एक भैंस थी। राजा के दो रानियाँ थीं-सीता और गीता। सीता भैंस से सहेली के समान तथा गीता गाय-बछड़े से सहेली और पुत्र-सा प्यार करती थी। एक दिन भैंस सीता से बोली- हे रानी! गाय-बछड़ा होने से गीता रानी मुझसे ईर्ष्या करती हैं। सीता ने कहा-यदि ऐसी बात है तो मैं सब ठीक कर लूँगी। सीता ने उसी दिन गाय के बछड़े को काटकर गेंहूँ के ढेर में गाड़ दिया। इसका किसी को पता न चला। राजा जब भोजन करने बैठा तब मांस की वर्षा होने लगी। चारों ओर महल के अन्दर मांस और खून दिखाई देने लगा। जो भोजन की थाली थी उसका सब भोजन मल-मूत्र हो गया। ऐसा देखकर राजा बहुत चिन्तित हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई कि हे राजन्! तेरी रानी सीता ने गाय के बछड़े को काटकर गेहूँ के ढेर में दबा दिया है, इसी से यह सब कुछ हो रहा है। कल गोवत्स द्वादशी है इसलिए भैंस को राज्य से बाहर करके गाय और बछड़े की पूजा करो। दूध तथा कटे फल को नहीं खाना, इससे तेरा तप नष्ट हो जायेगा और बछड़ा भी जिन्दा हो जाएगा। सायंकाल जब गाय आई तब राजा पूजा करने लगा। जैसे ही मन में बछड़े को याद किया वैसे ही बछड़ा गेहूँ के ढेर से निकलकर पास आ गया। यह देख राजा प्रसन्न हो गया। उसी समय से अपने राज्य में आदेश कर दिया कि सभी लोग गोवत्स द्वादशी का व्रत करें।
0 टिप्पणियाँ