कभी-कभी ज़िंदगी में सबसे गहरे घाव वो नहीं देते जो अजनबी होते हैं, बल्कि वो देते हैं जिन्हें हम अपना समझते हैं।
ये कविता “ज़ख्म” उसी दर्द, टूटे भरोसे और अंदर की खामोशी को बयां करती है, जो शब्दों में कहना आसान नहीं होता
"जख्म "
इश्क ने ऐसे -ऐसे जख्म थे मुझको दिए ।
ना दवा ना दुआ किसी से ना भरे गए,
दुनिया ने तो साथ देना ही ना था,
अपनो ने भी मेरे दिल पर छालें किए।।
हर खुशी मैंने दूसरों पर वार दी।
अपनी जान तक भी मैने अपने पे हार दी,
मुझको ग़म तो मिला था कुदरत की और से,
पर अपनो ने भी दिल मेरे पे बोल के चुभो भाले दिए।।
ज़ख्म तो दवा से ठीक भी हो सकते हैं।
दर्द दिल के शायद दुआ से दूर हो सकते है,
ग़म भी मेरा शायद कोई बांट ही लेता,
पर अपनो के दिए दर्द ने दिन मेरे काले किए।।
मैने किसी के साथ दर्द जब भी बांटना चाहा।
औरों ने फिर मेरे प्यार का मजाक उड़ाना चाहा,
बात इतनी ही होती तो ठीक भी था,
पर लोगों ने मिलकर लूट मेरे उजाले लिए,
लेखक:- नीता सिंह
💔 कविता का अर्थ (Explanation)
कविता हमें यह सिखाती है कि जब हम दिल से किसी को अपनाते हैं, तो उम्मीद भी उसी से होती है।
लेकिन जब वही लोग हमें चोट पहुंचाते हैं, तो वो दर्द सबसे गहरा होता है।
इसमें लेखक ने बताया है कि:
1.दुनिया से उम्मीद कम थी, लेकिन अपनों से ज्यादा
2.दर्द बांटना चाहा, पर मजाक बन गया
3.भरोसा टूटा, और जिंदगी के उजाले भी छिन गए
🌸 सीख (Life Lesson)
इस कविता से हमें ये सीख मिलती है कि:
हर किसी पर आंख बंद करके भरोसा नहीं करना चाहिए
खुद की खुशी को भी उतनी ही अहमियत दें
दर्द को दबाने के बजाय समझना जरूरी है
📌 Conclusion
“ज़ख्म” सिर्फ एक कविता नहीं, बल्कि उन अनकहे दर्दों की आवाज़ है जो हम अक्सर अपने अंदर ही दबा लेते हैं।
अगर आपने भी कभी ऐसा दर्द महसूस किया है, तो ये कविता आपको जरूर छू जाएगी।
✒️ लेखक
लेखक: नीता सिंह

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