कभी-कभी जिंदगी में सबसे ज्यादा दर्द हमें अपनों से ही मिलता है।जब विश्वास टूटता है, तो इंसान अंदर से पूरी तरह बिखर जाता है।“धोखा” एक ऐसी ही कविता है, जो बार-बार टूटने और फिर खुद को संभालने की कहानीबताती है।
धोखा
आज मेरे चारों तरफ फैला हुआ अंधकार है।
ना दिखे इस पार मुझको ना दिखे उस पार है,
हाथ के स्पर्श से छूना जिसे भी चाहा मैंने,
जख्म गहरा ही मिला मुझे हर बार है।
हर बार ये सोचूं अबकी ना धोखा खाऊंगी,
शायद मैं अंधकार के पार चली जाऊंगी,
दो कदम ही बढ़कर देखे थे मैंने
ठोकर खाकर ही गिरना मुझे हर बार है।
हमदर्दी के बोल कांटे की तरह चुभते हैं,
उसमें छुपा व्यंग दिल को मेरे दुखाते है,
दिन गया रात आई और सुबह हो गई,
टूट- टूट कर मुझे जुड़ना यूँ ही हर बार है।
मैं खुशी के दरवाजे पर दस्तक देती रही,
शायद हर रास्ते पर नजर मेरी रही,
लेकिन कोई हल मुझको ना मिल सका,
ठोकरों में मेरी ज़िंदगी मिल गई हर बार है ।
लेखक:- नीता सिंह
इस कविता में छुपा दर्द शायद हर उस इंसान का है,
जिसने कभी सच्चे दिल से भरोसा किया और बदले में सिर्फ धोखा पाया।
लेकिन हर टूटने के बाद खुद को संभाल लेना ही असली ताकत है।
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