आज भरी फूलों से कैसेे?
तू ही भला बता दे माली!
यह सब कुछ होता है कैसेे?
तरु के ही भीतर से भैया,
होता हैं फूलों का आना
कौन कहा मुंह ढके सोता,
कौन जानता पता ठिकाना?
रहते हैं कोने मैं दुबके,
कान खड़े रहते हों जैसे
हवा बुलाती चुपके- चुपके
उसको सुन लेते हैं कैसे?
फिर तो देर न कर पाते ये
जल्दी जल्दी मे मुंह धोकर
सज धज रंग पहन कर अनगिन
भीतर से आ जाते बाहर
बाहर आते मधु बरसाते,
तितली आती भवरे गाते
सबको हँस हँस गले लगाते
धरती को सुवास दे जाते!!!
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