तितली से लेकर पर उधार,
मुरगे की कलगी सिर सँवार।
बंदर की लंबी लगा पूँछ,
मछली-सी करती जल विहार।
इसकी विचित्र है चाल-ढाल,
हैं बड़े निराले रंग-ढंग।
उड़ चली गगन छूने पतंग।
रॉकेट से बहुत पुरानी है,
यह नील गगन की रानी है।
सूरज को छूना चाह रही,
हिम्मतवाली, सैलानी है।
इसके तन में कितनी तरंग,
इसके मन में कितनी उमंग!
उड़ चली गगन छूने पतंग।
बादल से बातें करती है,
बगुलों के साथ विचरती है।
हिरनी-सी इंद्रधनुष वाले,
आँगन में कूदी फिरती है।
कितनी भी ऊँची चढ़ जाए,
फिर भी रहती धरती के संग।
उड़ चली गगन छूने पतंग।
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