बृहस्पति महाराज की कहानी
एक बार देवराज इंद्र अपनी सभा में अहभाव से बैठे थे। उनकी सभा में देवता ऋषि गंधर्व किन्नर आदि भी मौजूद थे ।अप्सराएं नृत्य कर रही थी । उसी समय देव गुरु बृहस्पति भी वहां आप पहुंचे ।। उन्हें देखकर देवता ऋषि किन्नर आदि ने उनका सम्मान किया लेकिन इंद्र ने अहंकार वस उन्हें प्रणाम नहीं किया बृहस्पति देव ने इसे अपना अपमान समझा ।। और वे वहां से उठकर चले गए उनके जाने के बाद इंद्र को पश्चाताप हुआ कि मैंने देव गुरु का अपमान किया है।। यह भारी भूल हुई है यह सारा वैभव मुझे देव गुरु की कृपा से ही मिला है । आप उनके नाराज होने से मेरा सारा वैभव नष्ट हो जाएगा अतः चलकर मुझे उनसे क्षमा मांगने चाहिए जिससे उनका क्रोध शांत हो जाए और मेरा कल्याण हो इसलिए ब्रह्मा गुरु के पास चल दिए उधर देव गुरु ने योग बल से जान लिया कि इंद्र क्षमा मांगने के लिए मेरे पास आ रहा है। अतः क्रोध कीअवस्था में उससे मिलना उचित ने जान कर अंतर्ध्यान हो गए ।।देव गुरु को अपने स्थान पर न पाकर इंद्र लौट गए ।।

दैत्य गुरु वर्मा को जब यह जानकारी मिली तो दैत्य गुरु शुक्राचार्य की आज्ञा से उसने इंद्रपुरी को चारों ओर से घेर लिया ।।गुरु कृपा न होने से देवता परास्त होने लगे। भयभीत देवता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें सारा किस्सा बताकर रक्षा करने की प्रार्थना की तब ब्रह्माजी बोले कि इंद्रदेव तुमने देवगुरु को नाराज करके बड़ा अपराध किया है अब तुम्हारा भला इसी में है कि तुम तवस्ता ब्राह्मण के पुत्र को अपना गुरु बनाओ वह महाज्ञानी और तपस्वी है ।यदि वह तुम्हारा गुरु बन जाए तो तुम्हारा कल्याण संभव है ।ब्रह्मा जी के मुख से ऐसा सुनकर इंद्र तवस्ता के पास गए और विनम्र होकर उनसे गुरु बनने की प्रार्थना की तवस्ता ने कहा कि पुरोहित बनने से तपोबल घट जाता है ।अब मैं तुम्हारा गुरु नहीं बन सकता। लेकिन मेरा बेटा विश्वरूप तुम्हारा गुरु बनकर तुम्हारी रक्षा कर सकता है पिता की आज्ञा से विश्वरूप ने पुरोहित बनकर ऐसा कुछ किया कि इंद्र सुक्राचार्य को हराकर इंद्र के आसन पर विराजमान हुए!!
विश्वरूप के तीन मुख थे एक मुख्य सोम लता का रस निकालकर पी तथा दूसरे मुख से मदिरा पीता था और तीसरे मुख से अन्य का भोजन करता था कुछ दिनों के बाद इंद्र ने उससे कहा कि मैं आपकी कृपा से यज्ञ करना चाहता हूं विश्वरूप कि आज्ञा से यज्ञ प्रारंभ हुआ तो एक दैत्य ने विश्वरूप से कहा तुम्हारी माता तो दैत्य कन्या है। इसलिए हमारे कल्याण के लिए आहुति दैत्यों के नाम पर भी दिया करो उस दैत्य के कहने पर विश्वरूप आहुति देते समय धीरे से दैत्यों नाम भी बोलने लगा ।इसलिए देवताओं का तेज नहीं बढ़ पाया इंद्र को जब इस बात का पता लगा। तो उसने क्रोधित होकर विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले इस प्रकार मध्यपान वाले मुख से भंवरा सोमपति पीने वाले से मुख से कबूतर व अन्न खाने वाले मुख से तीतर बन गया विश्वरूप की मृत्यु के बाद इंद्र का स्वरूप प्रत्यय के प्रभाव में बदल गया देवताओं द्वारा 1 वर्ष तक पश्चाताप करने पर भी ब्रह्महत्या का पाप दूर ना हुआ ।
तो सभी देवताओं की प्रार्थना पर ब्रह्मा जी देव गुरु बृहस्पति सहित वहां आए और ब्रह्म हत्या के चार भाग किए ब्रह्महत्या के चार भागों में से एक भाग पृथ्वी को मिला इसी कारण पृथ्वी कहीं से ऊंची तो कहीं से नीचे और बीज बोने लायक नहीं रहती साथ ही ब्रह्मा ने उसे यह भी वरदान दिया कि पृथ्वी पर जहां भी गड्ढा होगा वह कुछ ही समय में अपने आप भर जाएगा ।
दूसरा भाग पेड़ों को दिया जिससे उनमें से गोंद बनकर रहता है इसलिए गूगल के अलावा अन्य सभी पेड़ अशुद्ध माने जाते हैं ।पेड़ों को ब्रह्मा ने यह वरदान दिया कि हर वर्ष सूख जाने पर भी पेड़ अपनी जड़ों के कारण फिर से हरे भरे हो सकते हैं ।
तीसरा भाग स्त्रियों को दिया गया । जिसके कारण हर महा राजस्वला होकर स्त्रियां पहले दिन चिंडाल दूसरे दिन ब्रह्म घात तीसरे दिन धोबिन समान रहकर चौथे दिन शुद्ध होती है ।स्त्रियों को संतान प्राप्ति का वरदान दिया ।
चौथा भाग जल को दिया गया जिसमें जल में फेन, शिवला आदि ऊपर आ जाते हैं ।जल को वरदान दिया कि जिस में भी वह डाला जाएगा वह वस्तु भाड़ में बढ़ जाएगी ।इस प्रकार इंद्र की ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त किया गया ।जो भी मनुष्य बृहस्पतिवार की इस कथा को पढता और सुनता है ।उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं तथा कष्ट दूर होते हैं
।। जय बृहस्पति महाराज।।
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